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संतालों में दिकू के प्रति गलत भावना को डाला (भरा) कौन?
दीन-दलित ब्यूरो (डायनामाईट):- दिनेष नारायण वर्मा, अध्यक्ष इतिहास विभाग बीõएसõकेõ कोलेजे, बरहरवा (साहिबगंज), संतोष कुमार आर्य, अध्यक्ष, प्राचीन इतिहास विभाग, बीõएसõएõ महिला कोलेज, बरहरवा (साहेबगंज) के कथनानुसार संताल परगना प्रमंडल के संतालों में दिकू अवधारणा के बदलते अर्थ और स्वरूप को स्पष्ट करना है एवं इसकी पृष्ठभूमि को संक्षिप्त में दर्षाना है। एमपिरिकल अध्ययन में प्राप्त लक्ष्यों के आधार पर इसके प्रभावों की व्याख्या की गई तथा इससे उत्पन्न सामाजिक तनाव एवं विरूपता के आधारभूत कारकों को खोजने का प्रसास किया गया है। इस निबंध को लेखक द्वारा प्राप्त षोधकों ने ”ए जरनल ओफ हिस्टोरिकल“ रिसर्च, जयपुर द्वारा दिसम्बर 13-14-1996 को जयपुर में आयोजित सेमिनार में प्रस्तुत किया गया। संताल परगना प्रमंडल बिगत दो षताब्दियों से संतालों की गतिविधियों का केन्द्र स्थल बना हुआ है। यधपि इस प्रमंडल में संतालों की अत्यधिक जनसंख्या है। और वे यहाँ आदिवासी समाज में षीर्षस्थ स्थान पर है, लेकिन वे संताल परगना प्रमंडल के मूल – निवासी नहीं हैं। उस समय ब्रिटिष सरकार से प्रोत्साहन और सुरक्षा पाकर संताल 18 वीं षताब्दी के अन्तिम दषक से और 19 वीं षताब्दी के पुर्वाद्ध के बीच यहाँ आने लगे और अन्ततः यहाँ के निवासी हो गए।